भारत में जब भी भरोसे और नैतिक व्यापार की बात होती है, तो सबसे पहले नाम आता है टाटा ग्रुप का। जमशेदजी टाटा द्वारा 1868 में स्थापित इस समूह ने पिछले डेढ़ सौ सालों में भारत के औद्योगिक विकास में जो योगदान दिया है, वह बेमिसाल है। लेकिन पिछले कुछ महीनों से टाटा ग्रुप चर्चा में किसी नई इनोवेशन या उपलब्धि के लिए नहीं, बल्कि एक बड़े आंतरिक विवाद के कारण है। सवाल उठ रहा है — क्या 180 बिलियन डॉलर का यह विशाल साम्राज्य किसी संकट में है?
टाटा ट्रस्ट और टाटा संस का रिश्ता क्या है?
टाटा ग्रुप की जड़ें दो प्रमुख संस्थाओं में निहित हैं — टाटा ट्रस्ट और टाटा संस। टाटा ट्रस्ट असल में एक परमार्थिक (philanthropic) संस्था है, जिसे टाटा परिवार ने स्थापित किया था। यह सिर्फ सामाजिक कार्य ही नहीं करता, बल्कि टाटा संस में 66% हिस्सेदारी का मालिक भी है। टाटा संस, टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी है — यानी वही तय करती है कि टाटा की कौन-सी कंपनी क्या करेगी, किस दिशा में बढ़ेगी और कौन-से प्रोजेक्ट्स पर काम करेगी। इस कंपनी के पास टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा केमिकल्स, टाटा कंज़्यूमर प्रोडक्ट्स, एयर इंडिया, टीसीएस, ताज ग्रुप जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी है।इस तरह टाटा ट्रस्ट → टाटा संस → टाटा ग्रुप ऑफ कंपनीज़ की संरचना बनी है। अगर ट्रस्ट में विवाद होता है, तो उसका सीधा असर पूरे ग्रुप पर पड़ना स्वाभाविक है।
विवाद की जड़: सत्ता की लड़ाई और नेतृत्व का संकट
2024 में रतन टाटा के निधन के बाद टाटा ट्रस्ट में एक लीडरशिप वैक्यूम पैदा हो गया। उनके बाद नोएल टाटा (रतन टाटा के हाफ ब्रदर) को टाटा ट्रस्ट का चेयरमैन नियुक्त किया गया। लेकिन कुछ ट्रस्टी इस फैसले से सहमत नहीं थे। धीरे-धीरे ट्रस्ट के भीतर दो गुट बन गए — एक तरफ नोएल टाटा कैंप, जिसमें वेनू श्रीनिवासन जैसे ट्रस्टी शामिल हैं, और दूसरी ओर मेहली मिस्त्री कैंप, जिसमें प्रमीत झावेरी, जहांगीर और डेरियस खंबाटा जैसे ट्रस्टी हैं।विवाद तब खुलकर सामने आया जब 11 सितंबर 2025 को हुई ट्रस्ट मीटिंग में विजय सिंह को टाटा संस के बोर्ड में री-अपॉइंट करने का प्रस्ताव रखा गया। नोएल टाटा और वेनू श्रीनिवासन ने इसका समर्थन किया, लेकिन चार ट्रस्टी इसके विरोध में रहे। चार और दो के वोट से प्रस्ताव गिर गया, और विजय सिंह ने रिजाइन कर दिया। बस यहीं से टाटा ट्रस्ट के अंदर का तनाव बाहर आ गया।
क्यों पड़ी सरकार को दखल देने की ज़रूरत?
जैसे-जैसे यह विवाद गहराता गया, सरकार की चिंता बढ़ती गई। आखिर टाटा ग्रुप सिर्फ एक कंपनी नहीं, बल्कि भारत के औद्योगिक और वित्तीय ढांचे का बड़ा स्तंभ है। टाटा ग्रुप का भारतीय शेयर बाजार में लगभग 5% हिस्सा है। यानी यहां अस्थिरता आने का असर पूरे बाजार पर पड़ सकता है। इसी कारण टाटा ग्रुप के प्रमुखों — नोएल टाटा और टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन — ने हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात की। भले ही बैठक की जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई, पर सरकार का संदेश साफ था — “टाटा ट्रस्ट में स्थिरता बहाल करें, विवाद को सार्वजनिक न होने दें।”
शापुरजी पलौंजी ग्रुप की नई मांग और विवाद का दूसरा पहलू
टाटा संस में दूसरा सबसे बड़ा शेयरधारक शापुरजी पलौंजी ग्रुप है, जिसके पास 18.4% हिस्सेदारी है। इस समूह ने हाल ही में मांग की है कि टाटा संस को स्टॉक मार्केट में लिस्ट किया जाए ताकि पारदर्शिता बढ़े।
उनका तर्क है कि वर्तमान में टाटा संस की नीतियां और फैसले “ओपेक” यानी अस्पष्ट हैं। अगर कंपनी लिस्ट हो जाती है, तो सार्वजनिक रूप से रिपोर्टिंग ज़रूरी होगी और अंदरूनी विवादों का असर कम होगा। लेकिन टाटा ट्रस्ट के कुछ गुट इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि इससे परिवार के नियंत्रण में कमी आ सकती है। यही असहमति विवाद को और बढ़ा रही है।
इतिहास दोहराता हुआ: साइरस मिस्त्री विवाद की याद
यह पहली बार नहीं है जब टाटा ग्रुप के भीतर मतभेद सार्वजनिक हुए हों। 2016-17 में भी रतन टाटा और साइरस मिस्त्री (जो शापुरजी पलौंजी परिवार से थे) के बीच बड़ा विवाद हुआ था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां टाटा ग्रुप के पक्ष में फैसला आया। फर्क सिर्फ इतना है कि तब संघर्ष कॉर्पोरेट गवर्नेंस को लेकर था, जबकि इस बार ओनरशिप और पावर स्ट्रक्चर को लेकर है।
आगे क्या हो सकता है?
स्थिति के तीन संभावित रास्ते हैं:
- ट्रस्टी आपस में समझौता कर लें और विवाद सुलझ जाए।
- कुछ ट्रस्टी अपने पद छोड़ दें या नए सदस्य नियुक्त किए जाएं।
- या फिर, मामला और बिगड़ जाए और इसका असर टाटा संस व अन्य कंपनियों की गवर्नेंस पर पड़े।
अगर तीसरा विकल्प सच हुआ, तो टाटा ग्रुप के निवेशकों और कर्मचारियों दोनों का भरोसा हिल सकता है — जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं होगा।
भारत के कॉर्पोरेट सेक्टर पर असर
टाटा ट्रस्ट विवाद सिर्फ एक समूह की कहानी नहीं है। यह उन तमाम बड़े भारतीय परिवार-नियंत्रित व्यवसायों के लिए एक सबक है जो उत्तराधिकार, पारदर्शिता और गवर्नेंस के मुद्दों से जूझ रहे हैं। फॉरेन इन्वेस्टर्स, जो टाटा को भारत के भरोसेमंद ब्रांड के रूप में देखते हैं, अब अधिक सतर्क होंगे। आरबीआई और सेबी जैसे नियामक संस्थान भी शायद भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के लिए सख्त नियम बनाएंगे।
निष्कर्ष
टाटा सिर्फ एक कंपनी नहीं, बल्कि भारत की औद्योगिक आत्मा है।टाटा ट्रस्ट में चल रही इस अंदरूनी खींचतान का असर केवल शेयर मार्केट या निवेशकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भारत की कारोबारी संस्कृति और प्रतिष्ठा को भी प्रभावित करेगा। अब सबकी निगाहें इस पर हैं कि क्या नोएल टाटा और अन्य ट्रस्टी आपसी मतभेद भुलाकर फिर से उस “टाटा भरोसे” को कायम रख पाएंगे, जो दशकों से हर भारतीय के दिल में बसा है।